Saturday, January 14, 2017

आफ़ताब

घेर के रक्खो
जितना घेर सकते हो,
ये आफ़ताब है
निकल के ही रहेगा!

एक तूफान मन में,
दबा रक्खा है,
मचलने पे आएगा,
मचल के ही रहेगा !

लाख नरम कर लूँ
लहजा अपना,
जो आंच पे चढ़ा है वो
उबल के ही रहेगा !

शब्दभेदी लाख छुपो
अपने दरबे में तुम,
हर शब, चाँद छत पर
टहल के ही रहेगा!

आकाश का सूनापन

शाम होते ही ,
आकाश का सूनापन
मेरे कमरे के
एक कोने में उतर आता है।
.
उसी कोने में जहां ,
घंटों मैं टकटकी लगाये ,
घूरता रहता हूँ
तुम्हें सोचते हुए !
.
पता है तुम्हें? इसी कोने
पार्क की वो बेंच देखता हूँ
जिस पर घंटों बैठे हम ,
बतियाते थे अनाप-सनाप !
.
इसी कोने में देखता हूँ
इकलौती गतिमान चीज ,
तुम्हारे कान की बालियां
जब ठहर जाती थी दुनियां !
.
और देखता हूँ कि जब ,
किवाड़ की ओट में
पत्थर बनी खड़ी थी तुम ,
मैं दुनियां छोड़ आया !
.
मेरे कमरे का यह कोना,
उलझन में डालता है !
समझ नहीं पाता इससे
मोहब्बत करूँ या नफरत !
............... - शब्दभेदी

भरम इश्क के

रोका है किसने आप भी आईये,
पहले भी आये हैं समझाने बहोत !
.
दीवानगी इतनी बुरी चीज फिर भी ,
एक शम्मा के देखो परवाने बहोत !
.
बुत मान के मुझसे मुंह फेर लो,
जाओ दुनियां में हैं बुतखाने बहोत !
.
दर्द की तिश्नगी हो तो यहां आईये,
वरना घूमों, शहर में है महखाने बहोत !
.
शब्दभेदी टूटेंगे सारे भरम इश्क के,
देखें हैं तुझ से दीवाने बहोत !

खालीपन

        बाहर-बाहर खूब सजा हूँ,
         अंदर कितना खाली हूँ !

      नहीं चाहिये किसी से कुछ भी,
        आप ही अपना सवाली हूँ !

      अमन-अमन का शोर मचाता,
           सबसे बड़ा बवाली हूँ !

         जितना भी बर्बाद हुआ मैं ,
          उतना ही अब आली हूँ !

'शब्दभेदी' दर्द है, एहसास औ बेफिक्री भी है ,
फिर भी इन्ही नगमात सा कितना ख्याली हूँ !

स्तीफा पत्र

मंजूर कर दो इस्तीफा मेरा,
हुस्नपरस्ती की चाकरी से
अच्छी तो खूब लगती है,
पर अब होती नहीं मुझसे !
.
और ले जाओ ये पुलिंदा
कागजात का, जिसमें
लिखा है सारा हिसाब
तेरा-मेरा और हमारा का !
.
खून-ए-दिल से भरी
ये दवात भी ले जाओ
जो एक भी हर्फ़ नहीं
लिखती किसी और को !
.
और हिसाब कर दो
पूरा मेरे मेहनताने का,
बची-खुची मेरी ज़िंदगी
मुझको आज़ाद दे दो !
.
मंजूर कर दो इस्तीफा मेरा..
.
- शब्दभेदी

Wednesday, January 4, 2017

सलीका

कैसे नाराजगी में एक बार
आँख दिखाने भर से ही
तुम समझ जाती थी कि
तुम्हारा यूँ गुनगुनाना
खलल दे रहा है मुझे
तुम्हारा हुस्न लिखने में !
इन बेहिज , बदतमीज ,
बेशरम , बेहया ,
बेअदब यादों को थोड़ा
सलीका सिखाओ , ये बेशक
तुम्हारी हैं लेकिन तुम जैसी
बिल्कुल भी नहीं हैं !
- शब्दभेदी

इस्तीफा पत्र



मंजूर कर दो इस्तीफा मेरा,
हुस्नपरस्ती की चाकरी से
अच्छी तो खूब लगती है,
पर अब होती नहीं मुझसे !
.
और ले जाओ ये पुलिंदा
कागजात का, जिसमें
लिखा है सारा हिसाब
तेरा-मेरा और हमारा का !
.
खून-ए-दिल से भरी
ये दवात भी ले जाओ
जो एक भी हर्फ़ नहीं
लिखती किसी और को !
.
और हिसाब कर दो 
पूरा मेरे मेहनताने का,
बची-खुची मेरी ज़िंदगी
मुझको आज़ाद दे दो !
.
मंजूर कर दो इस्तीफा मेरा..