Monday, January 30, 2017

बालकनी


       घर की बालकनी
        होती है, घर की
       आँखों की तरह!

          इन्हीं आँखों
        से हम, सवेरे का
     मनुहारी दृश्य देखते हैं
         और देखते हैं
           दोपहर की
    आवाजाही, चहल-पहल!

         सांझ को कभी
         डूबते सूरज को
       कहते हैं अलविदा
          और रात में
         इन्ही आँखों से
     दिल में उतरता है चाँद!

         लेकिन घर के
      खाली पड़ जाने से
  नीरस हो जाती है बालकनी!
       ठीक वैसे ही जैसे
       मन खाली होने से,
     पथरा जाती हैं आँखे!
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           शब्दभेदी

उहापोह

'भाई लाइफ में बहुत कुछ होता है न होने के लिए..!'
सबकुछ ठीक है वाली बनावटी शकल लिए बैठे ऋषि को झकझोरते हुए अनन्त कहता है।बुझी हुई आँखों को मीचते हुए ऋषि उसकी बात पर गौर करता है तो अनन्त दुहराता है...
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'ऋषि मेरे भाई, यूपीएससी के इम्तेहान को ही ले लो.. ऑल इज कम्पल्सरी के इस प्रश्नपत्र में बहुत से प्रश्न होते हैं जो नहीं करने के लिए बनाये गए होते हैं और समझदार कॉम्पटीटर बिना पछतावे के इसे छोड़कर आगे बढ़ता है। ठीक ऐसे ही हमारे जीवन में भी बहुत कुछ होता है न होने के लिए। ऐसी चीजों को भूल कर आगे बढ़ने में ही समझदारी होती है।'
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Anant के इस विचित्र दर्शन पर कमरे में बैठे बाकी लोग जोर-जोर से ठहाके लगाने लगते हैं!
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ऋषि को अब तक कई लोगों ने कई-कई दफे समझाया था 'जो होता है अच्छे के लिए होता है शायद तुम्हारे लिए कुछ बेहतर होना तय हो!'
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उसके दिमाग में हमेशा यही उहापोह का विषय था.. उठते-बैठते, सोते-जागते हर वक्त ये मशवरे मगज में मथते रहते.. खुद से एक ही सवाल हमेशा करता 'चेतना से बेहतर क्यों तय है, चेतना ही क्यों नहीं?
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जाने का वक्त हो गया, ऋषि फिर मिलने के वादे के साथ सभी से अलविदा लेता है। अनन्त के घर से निकलकर, सड़क पर आकर जैसे ही ऋषि अकेला पड़ता है फिर अपनी ही दुनियां में खो जाता है.. वही उहापोह फिर से.. विषय भी वही.. लेकिन अब उसके मन में उठने वाला सवाल बदल गया है..!
अब सवाल था..
'क्या चेतना का मेरे जीवन में होना भी न होने के लिए था?'
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- शब्दभेदी
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नोट: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं। भौतिक जीवन में किसी घटना अथवा व्यक्ति नाम का मिलना महज एक इत्तेफाक है

ताले और छुरियां


सियासत के पास
आपके लिए छुरियां हैं
और कुछ ताले भी!
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छुरियां जो प्रतीक हैं
काट-पीट,
तहस-नहस का!
और ताले देते हैं
सुनिश्चितता,
आपकी सुरक्षा के!
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आप तय कीजिये
आपको अपनी जुबां पर
ताले लगाने हैं!
या फिर बार-बार
सच बोलकर
जुबां कटवा लेना है!
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ध्यान रहे..!
ताले कम कम हैं
और छुरियां जियादा !
- शब्दभेदी

ख्वाहिशों के चित्र

ख्वाहिशों के चित्र उकेरे हैं ज़िन्दगी के पन्ने पे,
रंग भरने को मैं खून-ए-दिल तक उतारूंगा!
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ताज्जुब न करना जो चाँद-तारे मांग बैठूं मैं,
मेरी औकात भर का फलक यहीं पर उतरूंगा!
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उतारे कोई शायर अपने दर्द को गज़लों में जैसे
ऐसे ही मेरे सारे ख्वाब, जमीं पर उतारूंगा !
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शब्दभेदी इस बात को मेरी गुस्ताखी समझो तुम,
सीढ़ी लगा आया हूँ, आफ़ताब छत पर उतारूंगा!

जश्न-ए-जम्हूरियत


अंधेरों में कब तक घुट-घुट मरेंगे,
चलो उम्मीदों का चराग जलाते हैं!

जो खो दिया हमने सियासत की आंधी में,
आने वाली नश्ल को उससे बचाते हैं!

अमन के बदले नफरतों के जो सौदे हुए,
उनका दे के आते हैं अपना ले के आते हैं!

शब्दभेदी मोहब्बत का इत्र हवा में घोल दो,
आओ हम भी जश्न-ए-जम्हूरियत मनाते हैं!
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*(जश्न-ए-जम्हूरियत : गणतंत्र का उत्सव)
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हम और आप.. जैसे कदम-कदम पर देश और देशभक्ति की परिभाषाए गढ़ते हैं वैसे ही सुनिश्चित करें कि जन-जन का तंत्र और उसके उत्सव में देश का आखिरी जन भी पुरे हर्ष के साथ शामिल हो !
बाकी आपको भी हैप्पी रिपब्लिक डे.. आप खुद समझदार हैं..!
जय हो !
हम और आप.. जैसे कदम-कदम पर देश और देशभक्ति की परिभाषाए गढ़ते हैं वैसे ही सुनिश्चित करें कि जन-जन का तंत्र और उसके उत्सव में देश का आखिरी जन भी पुरे हर्ष के साथ शामिल हो !
बाकी आपको भी हैप्पी रिपब्लिक डे.. आप खुद समझदार हैं..!
जय हो !

जमीनी किरदार


हमेशा जमीन पर खड़े होकर
आसमान की विशालता
को निहारते हुए
बेख़ौफ़ परिंदों को उड़ते देखना
और अपने लिए सिर्फ सपने बुनना
आखिर कितना उचित है !

कभी-कभी आसमान के
बहुत करीब खड़े होकर
जमीन की तरफ देखना,
और भागती-दौड़ती दुनिया में ही
अपना जमीनी किरदार गढ़ना भी
बेहद जरूरी होता है !

- शब्दभेदी

Saturday, January 14, 2017

अपना घर

भागती सड़कें, जगमगाता शहर देखा,
ढिबरी की मद्धम रोशनी में
अपना घर अच्छा लगता है!
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बड़े फव्वारे, चौक-चौराहे देखा,
छोटी सी पुलिया वाला वो
छोटा नहर अच्छा लगता है!
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बेगनबोलिया से सजी बगिया देखा,
वो अपने बाग के कोने का
सूखा सजर अच्छा लगता है!
.
बड़े कामों में मसरूफ लोग देखा,
खलिहरी में धूप सेकता
दोपहर अच्छा लगता है!
.
- शब्दभेदी