Friday, May 5, 2017
Sunday, April 9, 2017
सफलता
गांव के छोटे बच्चों के साथ मैं ट्यूबवेल पर बैठकर मजे ले रहा था। कुछ ही दूर पर पड़ोस के पण्डित जी से बाऊ जी बतिया रहे थे.. कुछ देर की बातचीत से मुझे समझ में आया कि मेरे बारे में ही कुछ बात हो रही है।
दूर से समझने की नाकाम कोशिशें खतम हो जाने के बाद मैं पण्डित जी के जाने का इंतजार करने लगा। पण्डित जी के जाते ही मैं दौड़कर पहुचा..
'बाऊजी..! क्या कह रहे थे महराज?'
गांव के सभी मामलों के सबसे अच्छे सलाहकार और मुझे सबसे कम सलाह देने वाले बाऊजी का जवाब था..
'कुछ नहीं...!
मैंने बची-खुची हिम्मत जुटाई.. और फिर पूछा..
'पण्डित जी मेरे बारे में कुछ कह रहे थे क्या?'
उधर चुप्पी इधर डर...
'बेटा! सफलताओं के सैकड़ों बाप होते हैं, असफलताओं में अपना खुद का बाप अपना नहीं होता!'
गमछे को कंधे पर रखकर बाऊजी बोले औऱ बाजार की ओर चल पड़े..!
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मैं सर खुजाता बैठा रहा.. और अभी तक निश्चिंत नहीं हो पाया हूँ कि क्या मैं जो समझ रहा हूँ बाऊजी की बात का वही मतलब था... 😣
Wednesday, April 5, 2017
मझधार
तेरे शहर में ऐसे फिर मेरा आना हो रहा है,
मझधार में फिर कश्ती का जाना हो रहा है!
मुसलसल लौट रही हैं जेहन में वो सारी यादें
जिन्हें बीते भी अब इक जमाना हो रहा है!
कोई उम्मीद नहीं मिलन की रात भी होगी,
दिल की दुल्हन का मगर सजना-सजाना हो रहा है!
नजाहिर है कुछ फिर भी, पड़ोसी पूछ बैठा,
खुशी किस बात की है क्या छिपाना हो रहा है!
बता तो दें उसको मगर कैसे बताएं कि
किसी सपने को याद करके मुस्कुराना हो रहा है!
जरूरतें जिसको बना चुकी हैं मुकम्मल आदमी
शब्दभेदी फिर वही आशिक़-दीवाना हो रहा है!
Sunday, April 2, 2017
वक्त-बेवक्त
सूखते जख्म कुरेदना है आदत जमाने की
खैर छोड़िए क्या बताएं रवायत जमाने की!
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वक्त-बेवक्त छेड़ जाता है कोई उसकी बात,
लाख गुजारिश करूं मैं न याद दिलाने की!
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जिरह किसी से नहीं करता अपनी तंगहाली का
भूलने दो ये बातें नहीं है कहने-कहाने की!
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बेहिज दिल भी अपना होकर अपना नहीं है
क्या-क्या न किये जतन इसको बहलाने की!
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शब्दभेदी कोशिशें मुसलसल जारी हैं मगर
मैं दावे नहीं कर सकता सब भूल जाने की!
Monday, March 27, 2017
रंगमंच
अरसे से उदास चेहरे पे शह पाना चाहता हूँ,
मैं जैसे मुस्कुराता था वैसे मुस्कुराना चाहता हूँ!
राहों की खाक से परे, मिट्टी में मैं खेलूं,
मौज-औ-शुकूँ का वही जमाना चाहता हूँ!
आजमा के देखा मैंने अपनों - परायों को,
किसी हद तक खुदको आजमाना चाहता हूँ!
रंगमंच का खेल था तालियां भी खूब बजी,
वक्त हो चला है अब परदा गिराना चाहता हूँ!
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शब्दभेदी
Tuesday, March 21, 2017
समांतर
और मेरी ज़िंदगी की भागदौड़
दोनों समांतर बढ़ रही हैं,
बावजूद तमाम उतार चढ़ाव के!
अफ़सोस, कसक और तन्हाई
जिसमें खुद को पाता हूँ
परेशान हमेशा-हमेशा!
बढ़ता जा रहा हूँ आगे अनवरत
इस रेखा पर चलते हैं
चाकरी, वेतन और जीवन यापन!
दो समांतर रेखाओं को मिलते
लेकिन कयास है कि शायद
अनन्त में जाकर मिल जाती हों!
मेरे ग़म और जीवन को मिलते
लेकिन यह भी जाकर मिल जाते हैं
अनन्त यादों के अदृश्य क्षेत्र में!
Thursday, March 16, 2017
जिंदगी का सफ़र
जल्द लौटने का वादा था सफ़र की शुरुआत से,
मुसलसल चलता रहा धोखा किया अपने-आप से!
खौफ खाकर इक परिंदा आसमां में उड़ता रहा
आप भी जमीन के हो साहब क्या बताएं आपसे!
उड़ती रही जब तक पतंग, पेचों ने खूब वार किये,
कट गई जो दफ़अतन, सबने लूटा भरे उल्लास से!
'शब्दभेदी' तू रुक गया तो सोचता है रुक जाएगी?
बिन रुके ही दौड़ती है दुनिया अपनी ही रफ्तार से!
